यादव समाज - परिचय

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8. यदु

यदु 

यदुवंश के संस्थापक यदु, महाराजा ययाति के पुत्र थे। उनका जन्म  देवयानी  के गर्भ से हुआ। यदु के वन्शज यादव कहलाए। महाराज   ययाति के दो  रानियाँ थी  एक का नाम था देवयानी  और दूसरी का  शर्मिष्ठा ।  देवयानी के गर्भ से यदु और तुर्वसु नामक दो पुत्र तथा शर्मिष्टा के गर्भ से दुह्यु,अनु और पुरू नामक तीन पुत्र हुए। ययाति के पुत्रो से जो वंशज चले वे इस प्रकार  है;- १. यदु से यादव, २. तुर्वसु से यवन, ३. दुह्यु से भोज, ४. अनु से म्लेक्ष, ५. पुरु से पौरव।
 
 यदु के  नाना शुक्राचार्य ने  उनके पिता ययाति को श्राप दे  दिया था, जिससे वे  असमय (भरी जवानी में)  वृद्ध हो गए ।  राजा अपने बुढ़ापे से बहुत  दुखी था।  यदि कोई उन्हें अपनी जवानी देकर उनका बुढ़ापा ले लेता तो वे पुनः जवान हो सकते थे । राजा ने अपने ज्येष्ठ पुत्र यदु को जवानी  देकर  बुढ़ापा लेने को कहा।  किन्तु यदु ने इंकार कर दिया। तब उन्होंने दुसरे पुत्र तुर्वसु को कहा तो उसने भी इंकार कर दिया। इसी प्रकार महाराज के तीसरे और चौथे पुत्र ने भी  इंकार कर दिया। तब राजा ने अपने कनिष्ठ पुत्र पुरु से पुछा तो वह  सहर्ष जवानी के बदले  बुढ़ापा लेने को सहमत हो गया। पुरु की जवानी प्राप्त कर  ययाति  पुनः  तरुण  हो गए।  तरुणावस्था मिल जाने से  वे   बहुत काल तक यथावत  विषयों को  भोग करते   रहे।

उस समय की परम्परा के अनुसार  ज्येष्ठ पुत्र होने के कारण  पिता के सन्यास लेने  के बाद सिंहासन  का असली हकदार यदु था। किन्तु यदु द्वारा अपनी जवानी न दिये जाने के कारण महाराजा ययाति उससे रुष्ट हो गये थे । इसलिये यदु को राज्य नही दिया। वे अपने छोटे बेटे पुरू को बहुत चाहते थे और उसी को राज्य देना  चाहते थे। राजा के सभासदो ने जयेष्ठ पुत्र के रहते इस कार्य का विरोध किया।  किन्तु  यदु ने अपने छोटे भाई  का समर्थन किया और  स्वयम राज्य लेने से इन्कार कर दिया और ।  इस प्रकार ययाति  ने अपने  सबसे  छोटे पुत्र  पुरु को  प्रतिष्ठान की मुख्य शाखा का शासक बनाया।   अन्य पुत्रों  को  दूर-दराज के  छोटे छोटे   प्रदेश सौंप दिये। 

यदु को दक्षिण दिशा में चर्मणवती वर्तमान चम्बल क्षेत्र , वेववती (वेतवा) और शुक्तिमती (केन) का तटवर्ती प्रदेश मिला। वह  अपने सब भाइयो मे श्रेष्ठ एवं तेजस्वी निकला। यदु का विवाह धौमवर्ण की पाँच कन्यायों के साथ हुआ था। श्रीमद भागवत  महापुराण  के अनुसार यदु के चार  देवोपम पुत्र हुए जिनके नाम -सहस्त्रजित, क्रोष्टा,  नल और रिपु थे। इनमे से सहस्त्रजित  और क्रोष्टा के वंशज पराक्रमी हुए तथा इस धरा पर ख्याति प्राप्त किया।

यदु  के ज्येष्ठ पुत्र  सहस्त्रजित के  एक पौत्र का नाम था हैहय।  हैहय के  वंशज  हैहयवंशी यादव  क्षत्रिय कहलाए।  हैहय के हजारों पुत्र थे।  उनमे से केवल पाँच ही जीवित बचे थे बाकी सब युद्ध करते हुए परशुराम के हाथों मारे गए।बचे हुए पुत्रों के नाम थे-जयध्वज, शूरसेन,वृषभ, मधु और ऊर्जित। जयध्वज के तालजंघ नामक एक पुत्र था। तालजंघ के वंशज तालजंघ क्षत्रिय कहलाये। तालजंघ के  भी सौ पुत्र थे उनमें से अधिकांश को  राजा सगर ने मार डाला  था। तालजंघ के जीवित बचे  पुत्रों  में एक का नाम था वीतिहोत्र । वीतिहोत्र के मधु नामक एक पुत्र हुआ। मधु के वंशज माधव कहलाये। मधु के कई पुत्र थे। उनमें से एक का नाम था वृष्णि । वृष्णि के   वंशज  वाष्र्णेव कहलाये। हैहय वंश का विस्तृत परिचय इस  ब्लाग की पृष्ठ संख्या 9 पर उल्लिखित है।

यदु के दुसरे पुत्र का नाम क्रोष्टा  था। क्रोष्टा के  बाद उसकी   बारहवीं पीढी में   'विदर्भ' नामक  एक  राजा   हुए।  विदर्भ के  कश, क्रथ  और रोमपाद नामक  तीन पुत्र  थे। विदर्भ के तीसरे वंशधर  रोमपाद के  पुत्र का नाम था  बभ्रु। बभ्रु के कृति, कृति के  उशिक और उशिक के  चेदि नामक पुत्र हुआ।चेदि के नाम पर चेदिवंश का प्रादुर्भाव हुआ। इसी चेदिवंश में शिशुपाल आदि उत्पन्न हुए। विदर्भ के दुसरे पुत्र क्रथ के  कुल में आगे चल सात्वत नामक एक प्रतापी  राजा हुए। उनके नाम पर  यादवों को कई जगह सात्वत वंशी भी कहा गया  है।  सात्वत के  सात पुत्र थे। उनके नाम थे -भजमान, भजि, दिव्य, वृष्णि, देववृक्ष,  महाभोज और अन्धक। इनसे  अलग अलग  सात कुल चले। उनमें से वृष्णि और अन्धक  कुल के वंशज  अन्य की अपेक्षा अधिक विख्यात हुए।   वृष्णि  के नाम पर वृष्णिवंश चला। इस वंश में लोक रक्षक भगवान श्रीकृष्ण ने  अवतार लिया था जिससे यह वंश परम पवित्र हो गया और इस धरा पर सर्वाधिक विख्यात हुआ।   श्रीकृष्ण की माता देवकी  का जन्म अन्धक वंश में हुआ था। इस कारण अन्धक  वंश ने भी बहुत ख्याति प्राप्त की।

 अन्धक के वंशज अन्धकवंशी यादव कहलाये।  अन्धक  के कुकुर, भजमन, शुचि और कम्बलबर्हि नामक चार लड़के थे।  इनमें से  कुकुर के वंशज बहुत  प्रसिद्द हुए। कुकुर के  पुत्र का नाम था वह्नि । वह्नि के विलोमा, विलोमा के कपोतरोमा और कपोतरोमा  के अनु  नामक पुत्र हुआ ।  अनु के पुत्र का नाम था अन्धक। अन्धक के पुत्र का नाम  दुन्दुभि और  दुन्दुभि के  पुत्र  का नाम  था अरिद्योत। अरिद्योत  के पुनर्वसु नाम   का एक  पुत्र हुआ  । पुनर्वसु के  दो संतानें थी- पहला आहुक नाम का पुत्र और दूसरा  आहुकी नाम की   कन्या।  आहुक के देवक और उग्रसेन नामक  दो पुत्र हुए। देवक के देववान, उपदेव, सुदेव,  देववर्धन नामक  चार पुत्र  तथा  धृत, देवा, शांतिदेवा, उपदेवा, श्रीदेवा, देवरक्षिता, सहदेवा और देवकी नामक चार कन्यायें थीं। आहुक के छोटे बेटे उग्रसेन के कंस, सुनामा, न्यग्रोध, कंक, शंकु, सुहू, राष्ट्रपाल, सृष्टि और तुष्टिमान नामक नौ पुत्र और कन्सा, कंसवती, कंका, शुरभु और राष्ट्र्पालिका नामक  पाँच कन्यायें।

सात्वत के  पुत्रो से जो  वंश परंपरा चली उनमें  सर्वाधिक  विख्यात  वंश का नाम है  वृष्णि-वंश।  इसमें सर्वव्यापी भगवान श्री कृष्ण  ने अवतार लिया था जिससे यह वंश  परम पवित्र हो गया। वृष्णि  के दो रानियाँ थी -एक नाम था  गांधारी और दूसरी  का माद्री। माद्री के एक देवमीढुष नामक एक पुत्र हुआ।  देवमीढुष के भी मदिषा और वैश्यवर्णा नाम की  दो रानियाँ थी।

देवमीढुष की बड़ी रानी मदिषा के गर्भ  दस पुत्र हुए,  उनके  नाम थे -वसुदेव, देवभाग, देवश्रवा, आनक, सुजग्य, श्यामक, कंक, शमीक, वत्सक और वृक। उनमें वसुदेव जी सबसे बड़े थे।  वसुदेव के जन्म के समय देवताओं  ने प्रसन्न होकर आकाश से पुष्प की वर्षा की थी और आनक तथा  दुन्दुभी का वादन किया था। इस कारण  वसुदेव जी को आनकदुन्दु भी कहा जाता है। श्रीहरिवंश पुराण में  वसुदेव के  चौदह पत्नियों होने का वर्णन आता है उनमें रोहिणी, इंदिरा, वैशाखी, भद्रा और सुनाम्नी नामक पांच पत्नियाँ पौरव वंश से,  देवकी आदि  सात पत्नियाँ अन्धक वंश से तथा  सुतनु  तथा  वडवा नामक, वासूदेव की   देखभाल करने वाली, दो स्त्रियाँ अज्ञात अन्य वंश से  थीं। उग्रसेन के बड़े भाई  देवक के  देवकी सहित सात कन्यायें थी। उन सबका  विवाह वसुदेव जी  से हुआ था। देवक की छोटी कन्या देवकी के  विवाहोपरांत उसका चचेरा भाई कंस जब   रथ में बैठा कर उन्हें घर छोड़ने जा रहा था तो  मार्ग में  उसे  आकाशवाणी से यह शब्द  सुनाई पडे  -"हे कंस! तू  जिसे इतने प्यार से ससुराल पहुँचाने जा रहा है उसी  के आठवे पुत्र के हाथों तेरी मृत्यु होगी।"  देववाणी सुनकर  कंस  अत्यंत भयभीत हो गया और   वसुदेव तथा  देवकी  को कारागार  में बंद  कर दिया।   महायशस्वी भगवान श्रीकृष्ण का जन्म इसी कारागार में हुआ था।  भगवान श्रीकृष्ण ने देवकी के गर्भ से  अवतार लिया और वसुदेव जी को  भगवान श्रीकृष्ण के पिता होने का परम सौभाग्य प्राप्त हुआ। वसुदेव के एक पुत्र का नाम बलराम था। बलराम जी श्रीकृष्ण के  बड़े भाई थे। उनका जन्म  वसुदेव की एक अन्य पत्नी  रोहिणी  के गर्भ से हुआ था। रोहिणी गोकुल में वसुदेव के चचेरे भाई नन्द के यहाँ   गुप्त रूप से रह रही  थी। श्रीकृष्ण और बलराम की विस्तृत जीवन गाथा  इस  ब्लाग के पृष्ठ संख्या  10  पर वर्णित है।

 देवमीढुष की दूसरी रानी वैश्यवर्णा  के गर्भ से पर्जन्य नामक पुत्र हुआ। पर्जन्य के नन्द सहित नौ  पुत्र हुए उनके नाम थे - धरानन्द, ध्रुवनन्द , उपनंद, अभिनंद,  .सुनंद, कर्मानन्द , धर्मानंद , नन्द और वल्लभ । नन्द से  नन्द वंशी यादव शाखा का प्रादुर्भाव हुआ। नन्द और उनकी पत्नी यशोदा  ने गोकुल में  भगवान श्रीकृष्ण का   पालन -पोषण किया। इस  कारण  वह आज भी  परम  यशस्वी और  श्रद्धेय हैं। वृष्णिवंश  की  इस वंशावली से ज्ञात होता है कि  वसुदेव और नन्द वृष्णि-वंशी यादव थे और दोनों  चचेरे भाई थे।
   

 यदवो ने कालान्तर मे अपने केन्द्र दशार्न, अवान्ति, विदर्भ् एवं महिष्मती मे स्थापित कर लिए। बाद मे मथुरा और द्वारिका यदवो की शक्ति के महत्वपूर्ण एवं प्रभावशाली केन्द्र बने। इसके अतिरिक्त शाल्व मे भी यादवो की शाखा स्थापित हो गई। मथुरा महाराजा उग्रसेन के अधीन था और द्वारिका वसुदेव के। महाराजा उग्रसेन का पुत्र कंस था और वासुदेव के पुत्र श्री कृष्ण थे।

महाराज यदु से यादव वंश चला। यादव वंश मे यदु की कई पीढ़ियों के बाद भगवान् श्री कृष्ण माता देवकी के गर्भ से मानव रूप में अवतरित हुए।

पुराण आदि से प्राप्त जानकारी के आधार पर सृष्टि उत्पत्ति से यदु तक और यदु से श्री कृष्ण के मध्य यादव वन्शावली (प्रमुख यादव राजवंश) इस प्रकार है:-

परमपिता नारायण
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ब्रह्मा
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अत्रि
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चन्द्रमा
( चन्द्रमा से चद्र वंश चला)
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बुध
|
पुरुरवा
|
आयु
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नहुष
|
ययाति
|
यदु
(यदु से यादव वंश चला)
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क्रोष्टु
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वृजनीवन्त
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स्वाहि (स्वाति)
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रुषाद्धगु
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चित्ररथ
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शशविन्दु
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पृथुश्रवस
|
अन्तर(उत्तर)
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सुयग्य
|
उशनस
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शिनेयु
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मरुत्त
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कन्वलवर्हिष
|
रुक्मकवच
|
परावृत्
|
ज्यामघ
|
विदर्भ्
|
कृत्भीम
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कुन्ती
|
धृष्ट
|
निर्वृति
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विदूरथ
|
दशाह
|
व्योमन
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जीमूत
|
विकृति
|
भीमरथ
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रथवर
|
दशरथ
|
येकादशरथ
|
शकुनि
|
करंभ
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देवरात
|
देवक्षत्र
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देवन
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मधु
|
पुरूरवस
|
पुरुद्वन्त
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जन्तु (अन्श)
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सत्वन्तु
|
भीमसत्व
भीमसत्व के बाद यदवो की मुख्य दो शाखाए बन गयी
(1)-अन्धक ......और....(2)-बृष्णि
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कुकुर............................देविमूढस-(देविमूढस के दो रानिया थी)
|
धृष्ट .............................|
|
कपोतरोपन......................|
|
विलोमान........................|
|
अनु................................|
|
दुन्दुभि...........................|
|
अभिजित.........................|
|
पुनर्वसु.............................|
|
आहुक..............................|
|
उग्रसेन/देवक ...................शूर
|
कन्स/देवकी ...................वासदेव
|
....................................श्रीकृष्ण

वृष्णि वंश

भीमसत्व के बाद यादव राजवंशो की प्रधान शाखा से दो मुख्य शाखाए बन गई-पहला अन्धक वंश और दूसरा वृष्णि वंश |अन्धक वंश में कंस का जन्म हुआ तथा वृष्णि वंश में भगवान श्रीकृष्ण का अवतार हुआ था|

वृष्णि वंश का संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है :-

ऊपर तालिका में बताया गया है कि देविमूढस (देवमीढ़) के दो रानिया थी पहली मदिषा और दूसरी वैश्यवर्णा| पहली रानी मदिषा के गर्भ से शूर उत्पन्न हुए| शूर की पत्नी भोज राजकुमारी से दस पुत्र तथा पांच पुत्रियाँ उत्पन्न हूई, जिनके नाम नीचे नाम नीचे लिखे गए है| उनके नामो के आगे उनसे उत्पन्न प्रसिद्द पुत्रो के नाम भी लिखे गए है:-
१. वासुदेव ..वासुदेव -से श्रीकृष्ण और बलराम

२. देवभाग .. देवभाग-से उद्धव नामक पुत्र

३. देवश्रवा.. देवश्रवा-से शत्रुघ्न(एकलव्य) नामक पुत्र

४. अनाधृष्टि.. अनाधृष्टि-से यशस्वी नामक पुत्र हुआ

५. कनवक .. कनवक -से तन्द्रिज और तन्द्रिपाल नामक दो पुत्र

६. वत्सावान .. वत्सावान-के गोद लिए पुत्र कौशिक थे.

७. गृज्जिम.. गृज्जिम- से वीर और अश्वहन नामक दो पुत्र हुए

८. श्याम.. श्याम -अपने छोटे भाई शमीक को पुत्र मानते थे|

९. शमीक-के कोइ संतान नही थी।

१०. गंडूष .. गंडूष -के गोद लिए हुए चार पुत्र थे.

इनके अतिरिक्त शूर के पांच कन्याए भी उत्पन्न हुई थी जिनके नाम नीचे लिखे है| उनके नामो के आगे उनसे उत्पन्न प्रसिद्द पुत्रो के नाम भी लिखे गए है:-
१. पृथुकी .. पृथुकी -से दन्तवक्र नामक पुत्र

२. पृथा (कुंती ) पृथा (कुंती) की कोख से कर्ण, युधिषिठर, भीम और अर्जुन नमक चार पुत्र हुए। 
..
३. श्रुतदेवा .. श्रुतदेवा - से जगृहु नामक पुत्र

४. श्रुतश्रवा .. श्रुतश्रवा - से चेदिवंशी शिशुपाल नामक पुत्र

५. राजाधिदेवी राजाधिदेवी - से विन्द और अनुविन्द नामक दो पुत्र हुए


देविमूढस (देवमीढ़) की दूसरी रानी वैश्यवर्णा से पर्जन्य नामक पुत्र हुआ| पर्जन्य के नौ पुत्र हुए जिनके नाम इस प्रकार है:-
१.धरानन्द
२. ध्रुवनन्द
३. उपनंद
४. अभिनंद
५. सुनंद
६. कर्मानन्द
७. धर्मानंद
८. नन्द
.९. वल्लभ


इसे यों समझे:
(इस तालिका में कुछ नाम छोड़ दिए गए है केवल महत्वपूर्ण नामो का उल्लेख है)
प्रकार है:-

देवमीढ
की
दो रानिया

१- मदिषा.........................................................२-वैश्यवर्णा
से........................................................................से
शूरसेन................................................................ पर्जन्य
से ..........................................................................से
..वसुदेव..देवभाग....पृथा...श्रुतश्रवा-------------------धरानन्द...ध्रुव...उप...अभि...सुनन्द
..v.........v..........v.......--.--.--.-.-....................--कर्मा...धर्मा...नन्द...बल्लभ्
..से .......से ......से ......से..
श्रीकृष्ण...उद्धव..पाण्डव..शिशुपाल

प्रदुम्न

अनिरुद्ध

ब्रजनाभि

श्रीकृष्ण आठ भाई थे| उनके नाम इस प्रकार है:-१.कीर्तिमान, २.सुषेण,३.भद्रसेन, ४. भृगु, ५.सम्भवर्दन, ६. भद्र,७. बलभद्र और ८. श्रीकृष्ण | इनमे से छः पुत्रो को कंस ने जन्म के तुरंत बाद मार दिया था|
अन्धकवंशी मथुरा के तथा वृष्णिवंशी द्वारिकापुरी के शासक हुए| मथुरा में जिस समय उग्रसेन और कंस थे उस समय द्वारिका में शूर के पुत्र वासुदेव जी राजा थे|





12 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

excellent research on yadav vansh,please write about RAJA BALI,AKOTAR MAHARAJ,KARE_GORE AND PANWARIA,WHY yadav vanshi worship all,is there any relation of all these with yadav kul.
Regards
cpy_28@yahoo.com

राजेश रंजन ने कहा…

प्रणाम
बहुत अच्छी जानकारी दिये हैं । एक बार पुन: धन्यवाद।

राजेश रंजन ने कहा…

प्रणाम
बहुत अच्छी जानकारी दिये हैं । एक बार पुन: धन्यवाद।

rajesh ranjan ने कहा…

प्रणाम
बहुत अच्छी जानकारी दिये हैं । एक बार पुन: धन्यवाद।

बेनामी ने कहा…

प्रणाम
बहुत अच्छी जानकारी दिये हैं । एक बार पुन: धन्यवाद।

DESHRAJ YADAV ने कहा…

Thankx sir...

RAM AWATAR ने कहा…

अमूल्य जानकारी के लिए धन्यवाद, मैं आपको बताना चाहता हूँ कि पृथा (कुंती) के चार पुत्र थे, सबसे बड़े पुत्र कर्ण (सूर्यपुत्र) थे. उनका नाम भी शामिल किया जाये..

Ram Avtar Yadav ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
Ram Avtar Yadav ने कहा…

@ Sh. Ram Awatar वंशावली के इस लेख में रूचि लेने और गलतियों को उजागर करने के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद

R P Singh ने कहा…

जो जानकारी आपने दी है उसके लिए आपको बहुत धन्यवाद , पर हम आपको बताना चाहते है , क़ि महाराज यदु के वंशज सब यदुवंशी हुए। यदुवंशी क्षत्री राजपूत है। और जो पहले अहीर थे वो आज अपने आप को यादव कहते है, यदुवंशी जादौन राजपूत थे । वशुदेव जी हरियाणा के रेवाडी जिला के रहने वाले थे । अब आप मुझे इतना बता दे की भगवान श्री कृष्ण का नामकरण यदुवंशी(जादौन) कुलगुरु गर्गाचार्य ने वशुदेव के कहने पर किया था। नन्द बाबा के कुलगुरु ने नहीं किया । भगवान कृष्ण की 64 वी पीढ़ी करौली राजस्थान के जादौन है।

Ramesh Yadav ने कहा…

रामावतार [यादव ] जी आपको शतशः धन्यवाद् ! आपका उपकार हम भूल नहीं सकते ! ईश्वर आपको ..दीर्घायु-आरोग्य दे ! धन्यवाद्

Ramesh Yadav ने कहा…

आपके अमूल्य जानकारी के लिए बहुत बहुत धन्यवाद् .......रामावतार जी !