यादव समाज - परिचय

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9. हैहय वंश

                                          

श्रीमदभागवत  महापुराण  के अनुसार यदु के चार  देवोपम पुत्र हुए जिनके नाम-सहस्त्रजित , क्रोष्टा, नल और रिपु थे। इनमे से सहस्त्रद और क्रोष्टा के वंशज पराक्रमी हुए और  इस धरा पर ख्याति प्राप्त किया।  क्रोष्टा के कुल  में  आगे  चलकर सात्वत का जन्म हुआ। उनके सात पुत्र थे उनमे से एक का  नाम वृष्णि था। वृष्णि से  वृष्णिवंश  चला। इस वंश में भगवान श्रीकृष्ण अवतरित हुये। सात्वत के  एक  अन्य पुत्र जिसका नाम  अन्धक था, उसके  नाम से  अन्धकवंश का अविर्भाव हुआ। इस वंश  मे कन्स का जन्म हुआ।

यदु के ज्येष्ठ  पुत्र  का  नाम  सहस्त्रजित था। उनके एक  पौत्र का नाम हैहय था। उसी हैहय के नाम पर हैहय वंश चला। सहस्त्रजित  के  पुत्र का नाम शतजित। शतजित के  तीन  पुत्र  हुए जिनके नाम   वेणुहय , महाहय और हैहय थे। हैहय उन तीनो में सबसे छोटा था। वह बहुत पराक्रमी था।  उनके नाम  से हैहयवंश चला और उनके वंशज हैहयवंशी यादव क्षत्रिय कहलाए।हैहय वंश कीज्ञात वन्शाली इस प्रकार है:-                 यदु->से->सहस्त्रजित->शतजित->हैहय->धर्म->नेत्र->कुन्ति->सोह्जी->महिष्मान->भद्रसेन-धनक-> कृतवीर्य  -से -अर्जुन-से - जयध्वज- से - तालजंघ-से -बीतिहोत्र -से -मधु। 

हैहय कुल में वीतिहोत्र, भोज, अवन्ति,तोंडीकेर, तालजंघ, भारत आदि क्षत्रिय समुदाय उत्पन्न हुए। इनकी संख्या बहुत ज्यादा है इसलिए इनके अलग-अलग नाम नहीं बताये गए। वृष आदि पुन्य आत्मा भी इस धरा पर उत्पन्न हुए। बीतहोत्र  का पुत्र मधु  भी इसी वंश में पैदा हुए जिनके नाम से थे माधव  वंश का उदय हुआ। हैहय वंश में  अर्जुन नाम का एक महाबली राजा हुए। वह  सहस्त्र भुजाओं से युक्त सातो द्वीपों का राजा था और लंकापति रावण का समकालीन था। उसने  एक बार महाबलशाली रावण को बंदी बना लिया था। इनका विस्तृत जीवन परिचय नीचे दिया गया है:

                                                      हैहय वन्शीय अर्जुन
महाभारत के मुख्य पात्र धनञ्जय, पार्थ आदि नामो से विख्यात वीर योद्धा, महान धनुर्धर कुन्ती पुत्र अर्जुन को कौन नही जानता? परन्तु यहा वर्णित जीवन चरित्र उन गाण्डीवधारी अर्जुन का नही है बल्कि उनसे सदियो पूर्व यदु के ज्येष्ठ पुत्र सहस्त्रजित के कुल मे उत्पन्न हैहय वन्शीय अर्जुन का है। जिन्हे सहस्त्रार्जुन अथवा कार्तवीर्य अर्जुन के नाम से भी जाना जाता है। वे सहस्त्र (हजार) भुजाओ से युक्त थे तथा संपूर्ण पृथ्वी को जीतकर सातो द्वीपो के राजा हुए ऐसा  कहा जाता है। उनका संक्षिप्त जीवन चरित्र इस प्रकार है:

हैहय वंश में सहजित के पुत्र राजा महिष्मान हुए जिन्होने माहिष्मतीपुरी बसायी। महिष्मान से भद्रसेन  हुए जो वाराणसी पुरी के अधिपति कहे गये है। भद्रसेन  के पुत्र का नाम  धनक था , जो  बहुत बुद्धिमान और बलवान थे। धनक  के चार पुत्र हुए उनमें से एक का नाम कृतवीर्य था। कृतवीर्य के  अर्जुन नामक एक बलशाली पुत्र हुआ  वह सातो द्वीपो का एकछत्र सम्राट था। उसने अकेले ही अपनी सहस्त्र भुजाओ के बल से संपूर्ण पृथ्वी को जीत लिया था। कृतवीर्यकुमार अर्जुन ने दस हजार वर्षो तक घोर तपस्या करके अत्रि पुत्र दत्तात्रेय की आराधना की। इस तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान दत्तात्रेय ने अर्जुन को वर मागने को कहा तो उसने चार वर मागे थे:-" पहला- युद्धरत होने पर मेरी सहस्त्र भुजाए हो जाये", दूसरा -"यदि कभी मै अधर्म कार्य मे प्रवृत्त होऊ तो वहा साधु पुरुष आकार रोक दे", तीसरा- "मै युद्ध के द्वारा पृथ्वी को जीतकर धर्म का पालन करते हुए प्रजा को प्रसन्न रखू" और चौथा वर इस प्रकार था - " मै बहुत से संग्राम करके सहस्त्रो शत्रुओ को मौत के घाट उतारकर संग्राम के मध्य अपने से अधिक शक्तिशाली द्वारा वध को प्राप्त होऊ"। इन चार वरदानो के फल्स्वरूप् युद्ध की कल्पना मात्र से अर्जुन के एक सहस्त्र भुजाएं प्रकट हो जाती थी। उनके बलपर उसने सहस्त्रो शत्रुओ को मौत के घाट उतार कर द्वीप, समुद्र और नगरो सहित पृथ्वी को युद्ध के द्वारा जीत लिया था। संसार का कोई भी सम्राट पराक्रम, विजय, यज्ञ, दान, तपस्या , योग, शास्त्रज्ञान आदि गुणो मे कार्तवीर्य अर्जुन की बराबरी नही कर सकता था। वह योगी था इसलिए ढाल-तलवार,धनुष-वाण और रथ लिए सातो द्वीपों में प्रजा की रक्षा हेतु सदा विचरता दिखाई देता था। वह यज्ञो और खेतों की रक्षा करता था। अपने योग-बल से मेघ बनकर अवश्यकतानुसार वर्षा कर लेता था। उसके राज्य मे कभी कोइ चीज नष्ट नही होती थी । प्रजा सब प्रकार से खुशहाल थी।

अर्जुन इतना शक्तिशाली था की एक बार उसने  ने मात्र  पांच  वाणो से  अभिमान से भरे हुए लंका के राजा रावण को सेना सहित मूर्छित करके बन्दी बना लिया था। यह सुनकर रावण के प्रपिता महर्षि पुलत्स्य वहाँ  गये और अर्जुन से मिले। पुलस्त्य मुनि के अनुनय-विनय  करने पर उसे दया आगई  और उसने रावण को मुक्त कर दिया।

कार्तवीर्य अर्जुन बहुत समय  तक सब प्रकार के रत्नो से संपन्न चक्रवर्ती सम्राट बना  रहा तथा अक्षय विषयो का भोग करता रहा। इस बीच न तो उसका बल क्षीण हुआ और नहि उसके धन का नाश हुआ। उसके धन के नाश की तो बात ही क्या, उसका ऐसा  प्रभाव था कि उसके स्मरण मात्र से ही दूसरो का खोया हुआ धन मिल जाता था।
एक बार भूखे - प्यासे अग्निदेव ने राजा अर्जुन से भिक्षा मागी। तब उस वीर ने अपना सारा राज्य अग्निदेव को भिक्षा मे दे दिया। भिक्षा पाकर अग्निदेव अर्जुन की सहायता से उसके  राज्य के सारे पर्वत वन आदि को जलाकर  राख कर दिया। उन्होने आपव नाम से विख्यात महर्षि वसिष्ठ का सूना आश्रम भी जला दिया। महर्षि वसिष्ठ का सूना आश्रम जला दिया गाय था, इसलिये उन्होने सहस्त्राजुन को शाप दे दिया- " हैहय! तू इतना अधर्मी हो  गया कि  मेरे इस पवित्र आश्रम को भी जलाये बिना न छोडा। अब तेरी मृत्यु निकट है। तुम्हारा सामना अब एक ऐसे  वीर से होगा जो तुसे अधिक  महाबली होगा। वह  तुझे  पराजित करके मौत के घाट उतार देगा।" दत्तात्रेय ने  अर्जुन को  चार वरदान दिए थे। उनमें से अर्जुन तीन वरदानों में प्रदत्त   सुख  को भोग चुका  था और अब चौथे  वरदान  के वास्तविकता में परिणित होने समय आ चुका  था।    अर्जुन की इच्छा  के अनुसार  दत्तात्रेय मुनि ने  उसको युद्ध के मध्य अधिक बलशाली द्वारा मारे जाने का चौथा वरदान दिया था। दत्तात्रेय द्वारा प्रदत्त इस चौथे वरदान को   वसिष्ठमुनि  ने  शाप  में परिवर्तित कर दिया। इस शाप के फलस्वरूप   भगवान शंकर  के अंशावतार  कहे जाने वाले  परशुराम  ने युद्ध के मैदान में कार्तवीर्यकुमार अर्जुन  का   वध कर दिया।

अर्जुन के हजारो पुत्र थे। उनमे से केवल पाच ही जीवित रहे। शेष सब परशुराम की क्रोधाग्नि मे नष्ट हो गये थे। बचे हुए पुत्रो मे जयेष्ठ पुत्र का नाम जयध्वज था। जय्ध्वज के पुत्र का नाम तालजङ्घ था। तालजङ्घ का पुत्र वीतिहोत्र हुआ वीतिहोत्र से मधु हुए। मधु के वन्शज माधव कहलाये।


* ( विभिन्न हिन्दू धर्म- ग्रन्थ यदु के पुत्रो की संख्या के बारे मे एकमत नही है। कई ग्रन्थो मे इनकी संख्या चार बतायी गई है तो कई मे पांच । उनके नामो मे भी भिन्नता है)

8 टिप्‍पणियां:

Jai Haihyvanshi ने कहा…

राम अवतार जी, हैहयवंश व श्री विष्णु जी के चक्रावतार महाराज सहस्रार्जुन का संक्षिप्त परिचय देने के लिए धन्यवाद ।

परंतु मैं पोस्ट मे एक correction बताना चाहूँगा की महाराज सहस्रार्जुन जी का वध नही हुआ। अंत समय मे उन्होने समाधि ले ली।
इसकी व्याख्या कई पौराणिक कथाओ मे की गयी है।

साक्ष्य के रूप मे माहेश्वर स्थित श्री राजराजेश्वर समाधि मंदिर, प्रामाणिक साक्ष्य है।
श्री राजराजेश्वर कार्तवीर्यार्जुन मंदिर मे समाधि मंदिर मे अनंत काल से 11 अखंड दीपक प्रज्ज्वलित है। यहाँ शिवलिंग स्थापित है जिसमे श्री कार्तवीर्यार्जुन जी की आत्म-ज्योति ने प्रवेश किया था। उनके पुत्र जयध्यज की राज्याभिषेक के बाद उन्होने यहाँ योग समाधि ली थी। मंत्र महोदधि के अनुसार श्री कार्तवीर्यार्जुन को दीपक प्रिय है इसलिए समाधि के पास 11 अखंड दीपक जल रहे है। दूसरी ओर दीपक जलने से यह भी सिद्ध होता है की यह समाधि श्री कार्तवीर्यार्जुन की है।

हिन्दू समाज मे स्मारक को पूजने की परंपरा नही है परंतु महेश्वर मे अनंत काल से पूजन परंपरा और अखंड दीपक जलते रहे है।

अतएव कार्तवीर्यार्जुन के वध की मान्यता निरधार व कपोल कल्पित है।

Jai Haihyvanshi ने कहा…

राम अवतार जी, हैहयवंश व श्री विष्णु जी के चक्रावतार महाराज सहस्रार्जुन का संक्षिप्त परिचय देने के लिए धन्यवाद ।

परंतु मैं पोस्ट मे एक correction बताना चाहूँगा की महाराज सहस्रार्जुन जी का वध नही हुआ। अंत समय मे उन्होने समाधि ले ली।
इसकी व्याख्या कई पौराणिक कथाओ मे की गयी है।

साक्ष्य के रूप मे माहेश्वर स्थित श्री राजराजेश्वर समाधि मंदिर, प्रामाणिक साक्ष्य है।
श्री राजराजेश्वर कार्तवीर्यार्जुन मंदिर मे समाधि मंदिर मे अनंत काल से 11 अखंड दीपक प्रज्ज्वलित है। यहाँ शिवलिंग स्थापित है जिसमे श्री कार्तवीर्यार्जुन जी की आत्म-ज्योति ने प्रवेश किया था। उनके पुत्र जयध्यज की राज्याभिषेक के बाद उन्होने यहाँ योग समाधि ली थी। मंत्र महोदधि के अनुसार श्री कार्तवीर्यार्जुन को दीपक प्रिय है इसलिए समाधि के पास 11 अखंड दीपक जल रहे है। दूसरी ओर दीपक जलने से यह भी सिद्ध होता है की यह समाधि श्री कार्तवीर्यार्जुन की है।

हिन्दू समाज मे स्मारक को पूजने की परंपरा नही है परंतु महेश्वर मे अनंत काल से पूजन परंपरा और अखंड दीपक जलते रहे है।

अतएव कार्तवीर्यार्जुन के वध की मान्यता निरधार व कपोल कल्पित है।

Jai Haihyvanshi ने कहा…

राम अवतार जी, हैहयवंश व श्री विष्णु जी के चक्रावतार महाराज सहस्रार्जुन का संक्षिप्त परिचय देने के लिए धन्यवाद ।

परंतु मैं पोस्ट मे एक correction बताना चाहूँगा की महाराज सहस्रार्जुन जी का वध नही हुआ। अंत समय मे उन्होने समाधि ले ली।
इसकी व्याख्या कई पौराणिक कथाओ मे की गयी है।

साक्ष्य के रूप मे माहेश्वर स्थित श्री राजराजेश्वर समाधि मंदिर, प्रामाणिक साक्ष्य है।
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हिन्दू समाज मे स्मारक को पूजने की परंपरा नही है परंतु महेश्वर मे अनंत काल से पूजन परंपरा और अखंड दीपक जलते रहे है।

अतएव कार्तवीर्यार्जुन के वध की मान्यता निरधार व कपोल कल्पित है।

Jai Haihyvanshi ने कहा…

राम अवतार जी, हैहयवंश व श्री विष्णु जी के चक्रावतार महाराज सहस्रार्जुन का संक्षिप्त परिचय देने के लिए धन्यवाद ।

परंतु मैं पोस्ट मे एक correction बताना चाहूँगा की महाराज सहस्रार्जुन जी का वध नही हुआ। अंत समय मे उन्होने समाधि ले ली।
इसकी व्याख्या कई पौराणिक कथाओ मे की गयी है।

साक्ष्य के रूप मे माहेश्वर स्थित श्री राजराजेश्वर समाधि मंदिर, प्रामाणिक साक्ष्य है।
श्री राजराजेश्वर कार्तवीर्यार्जुन मंदिर मे समाधि मंदिर मे अनंत काल से 11 अखंड दीपक प्रज्ज्वलित है। यहाँ शिवलिंग स्थापित है जिसमे श्री कार्तवीर्यार्जुन जी की आत्म-ज्योति ने प्रवेश किया था। उनके पुत्र जयध्यज की राज्याभिषेक के बाद उन्होने यहाँ योग समाधि ली थी। मंत्र महोदधि के अनुसार श्री कार्तवीर्यार्जुन को दीपक प्रिय है इसलिए समाधि के पास 11 अखंड दीपक जल रहे है। दूसरी ओर दीपक जलने से यह भी सिद्ध होता है की यह समाधि श्री कार्तवीर्यार्जुन की है।

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अतएव कार्तवीर्यार्जुन के वध की मान्यता निरधार व कपोल कल्पित है।

Jai Haihyvanshi ने कहा…

राम अवतार जी, हैहयवंश व श्री विष्णु जी के चक्रावतार महाराज सहस्रार्जुन का संक्षिप्त परिचय देने के लिए धन्यवाद ।

परंतु मैं पोस्ट मे एक correction बताना चाहूँगा की महाराज सहस्रार्जुन जी का वध नही हुआ। अंत समय मे उन्होने समाधि ले ली।
इसकी व्याख्या कई पौराणिक कथाओ मे की गयी है।

साक्ष्य के रूप मे माहेश्वर स्थित श्री राजराजेश्वर समाधि मंदिर, प्रामाणिक साक्ष्य है।
श्री राजराजेश्वर कार्तवीर्यार्जुन मंदिर मे समाधि मंदिर मे अनंत काल से 11 अखंड दीपक प्रज्ज्वलित है। यहाँ शिवलिंग स्थापित है जिसमे श्री कार्तवीर्यार्जुन जी की आत्म-ज्योति ने प्रवेश किया था। उनके पुत्र जयध्यज की राज्याभिषेक के बाद उन्होने यहाँ योग समाधि ली थी। मंत्र महोदधि के अनुसार श्री कार्तवीर्यार्जुन को दीपक प्रिय है इसलिए समाधि के पास 11 अखंड दीपक जल रहे है। दूसरी ओर दीपक जलने से यह भी सिद्ध होता है की यह समाधि श्री कार्तवीर्यार्जुन की है।

हिन्दू समाज मे स्मारक को पूजने की परंपरा नही है परंतु महेश्वर मे अनंत काल से पूजन परंपरा और अखंड दीपक जलते रहे है।

अतएव कार्तवीर्यार्जुन के वध की मान्यता निरधार व कपोल कल्पित है।

Ram Avtar Yadav ने कहा…

आदरणीय श्री "Jai Haihayvanshi Ji" के ध्यानार्थ :
आपके द्वारा व्यक्त जानकारी (correction ) स्वागत योग्य है। आपने इस पौराणिक कथा में दिलचस्पी ली और अपने कीमती विचार प्रकट किये , उपयोगी जानकारी प्रस्तुत की , इसके लिए आपका हार्दिक आभार । इस जानकारी को लेख में शामिल करके गलती को सुधारा जाएगा.

Ram yaduvanshi ने कहा…

ram avtar ji prashuram shankar ke avtar nahi the vah bhagvan vishnu ke avtar the.
aap ki jankari achhi hai lekin usme kuchh kamiya hai .
hare krishna
ram yaduvanshi
mumbai.

Seshadeba Behera ने कहा…

Agni Puran (Sanskrit) under Yadu Vansh gives vivid narration on the Haihayas. Parshuram has been immoratalised by interpolation, otherwise, no incarnation should take such blemish act on earth. Plz make correction as stated above. Thanks for your blog.